राजस्थान का नया सियासी 'सितारा': शेखावाटी में उगा कांग्रेस का सूरज...कैसे गोविंद डोटासरा बने जीत के किंग?
Govind Singh Dotasara: राजस्थान में लोकसभा चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया जहां नतीजे आने के दो दिन बाद भी अलग-अलग स्तर पर विश्लेषण किया जा रहा है. कांग्रेस ने 10 सीटें जीत कर 10 साल के सूखे को खत्म किया। वहीं देश में तीसरी बार सरकार बनाने जा ही बीजेपी को राजस्थान ने काफी निराश किया है जहां उसे 14 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। सूबे के इन नतीजों में कई तरह के मायने छिपे हैं और कांग्रेस का खाता खुलने के साथ ही कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर भी चर्चा होनी शुरू हो गई है. इधर चुनावों से लेकर नतीजों तक एक नाम चर्चा के केंद्र में लगातार बना हुई है.
हम बात कर रहे हैं कि पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasara) की जो कांग्रेस के उदय में एक नए राजनीतिक सितारे के तौर पर उभरे हैं. दरअसल कांग्रेस ने 7 आरक्षित सीटों में से 5 सीटों पर बाजी मारी है और शेखावाटी की चारों सीटों पर क्लीन स्वीप किया है।
मालूम हो कि डोटासरा शेखावाटी से आते हैं और पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में भी शेखावाटी बेल्ट में कांग्रेस बीजेपी का रथ रोकने में कामयाब हुई थी। आइए जानते हैं कि अब पीसीसी चीफ (PCC Chief) के नाते डोटासरा का राजस्थान में कैसा भविष्य रहने वाला है और क्या वह आने वाले समय में मुख्यमंत्री के भी दावेदार हो सकते हैं?
डोटासरा ने रोका शेखावाटी में BJP का रथ!
बता दें कि कांग्रेस ने राजस्थान गठबंधन के साथ मिलकर 11 सीटों पर जीत हासिल की है जिसमें शेखावाटी और गठबंधन की सीटों पर जीत की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। वहीं इन सीटों पर जीत का सेहरा बांधने की गवाही झुंझुनूं, चूरू, सीकर, श्रीगंगानगर और जैसलमेर-बाड़मेर जैसी सीटें दे रही है जहां टिकट वितरण से लेकर गठबंधन का संतुलन बनाए रखने में पीसीसी चीफ के तौर पर डोटासरा ने अहम भूमिका निभाई। मालूम हो कि पीसीसी चीफ के नाते यह डोटासरा का पहला लोकसभा चुनाव था।
अगर हम थोड़ा पीछे चले तो राजस्थान में 2020 में मानेसर कांड के बाद डोटासरा की पीसीसी चीफ के तौर पर एंट्री हुई जिसके बाद उन्होंने लगातार संगठन की कमजोर कड़ियां कसने का काम किया. वहीं इसके बाद पिछले साल 2023 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए जहां रिवाज के मुताबिक कांग्रेस की सरकार तो चली गई लेकिन पार्टी ने 70 सीटें हासिल की. इसके अलावा बाद में करणपुर उपचुनाव में भी कांग्रेस ने जीत हासिल की।
RSS पर सीधा आक्रामक अंदाज
अब चर्चा हो रही है कि आखिर कांग्रेस की जीत के पीछे सबसे ज्यादा चर्चा डोटासरा की क्यों हो रही है, डोटासरा ने कौनसी रणनीति अपनाई जिसकी बदौलत वो सूबे के सियासी पटल पर तेजी से उभरे हैं। बता दें कि लोकसभा चुनावों के दौरान लगातार उनका कहना था कि कांग्रेस राज्य में 12-13 सीटों पर बेहद मजबूत है और जीत दर्ज करेगी।
वहीं नतीजों से एक दिन पहले 3 जून को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश द्वारा वीडियो कांफ्रेंसिंग पर लिए गए फीडबैक में भी पीसीसी चीफ ने बाकायदा सीटों के नाम लेकर 12-13 पर जीत का दावा किया था। बता दें कि डोटासरा की राजनीति शुरू से ही आक्रामक रही है जहां वह विधानसभा के भीतर और बाहर लगातार बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री की घेराबंदी कर चुके हैं।
इसके अलावा वह आरएसएस पर सीधे हमला करते हैं जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग लाइन में खड़ा करता है। विधानसभा चुनावों के दौरान उनका संघ को लेकर एक बयान काफी चर्चा में रहा था जिसके बाद संघ और बीजेपी के कई नेताओं ने उन्हें आड़े हाथों लिया था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डोटासरा का संघ पर सीधा हमलावर रूख ही उन्हें जाट बेल्ट में मजबूती दिलाता है.
जाटों के खाली स्पेस में डोटासरा का उभार!
डोटासरा का जाट स्पेस में कैसे उभार हुआ ये समझने के लिए तारानगर विधानसभा चुनाव और चुरू लोकसभा चुनाव इन दो सियासी घटनाक्रमों पर नजर डालना बेहद जरूरी है। दरअसल पिछले साल तारानगर के विधानसभा चुनावों में डोटासरा vs राजेंद्र राठौड़ की जंग शुरू हुई जो देखते ही देखते जाटvsराजपूत की बाइनरी में फंस गई और राठौड़ की हार के पीछे नरेंद्र बुड़ानियां से ज्यादा चर्चा डोटासरा की हुई थी। इसके बाद चुरू लोकसभा चुनावों में राजेंद्र राठौड़ vs राहुल कस्वां की जंग में जाट बनाम राजपूत का एक नया अध्याय लिखा गया। इस पूरे घटनाक्रम में डोटासरा जाटों के एक बड़े चेहरे के तौर पर उभरे।
बता दें कि राजस्थान में कांग्रेस की सियासत में शीशराम ओला से लेकर नाथूराम मिर्धा तक जाटों के बड़े नाम हुए जिसके बाद लंबे अरसे से ये स्पेस खाली था। वहीं अब कांग्रेस में और जाटों के बीच डोटासरा एक बड़े वोट पुलर के रूप में आगे आए हैं। वहीं बीजेपी में जिस तरह से पिछले विधानसभा चुनावों से पहले सतीश पूनिया को हटाकर जाटों को दरकिनार करने का मैसेज गया उसमें विपक्षी दल का होने का बावजूद सामाजिक और राजनीतिक तौर पर डोटासरा ने बड़ा जाट वोटबैंक शिफ्ट करने का काम किया।