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इस दीपावली!जानिए क्यों राजस्थान के इस मंदिर में 350 साल से हो रही है 'प्रसाद लूटने' की परंपरा!

Govardhan Pooja 2024: गोवर्धन पूजा या अन्नकूट, जो कि 2 नवंबर को मनाया जाएगा, एक ऐसा पर्व है जो न केवल आस्था का उत्सव है, बल्कि एक अनूठी परंपरा को भी संजोए हुए है। राजस्थान के नाथद्वारा में, जहां वल्लभ...
01:43 PM Nov 01, 2024 IST | Rajesh Singhal

Govardhan Pooja 2024: गोवर्धन पूजा या अन्नकूट, जो कि 2 नवंबर को मनाया जाएगा, एक ऐसा पर्व है जो न केवल आस्था का उत्सव है, बल्कि एक अनूठी परंपरा को भी संजोए हुए है। राजस्थान के नाथद्वारा में, जहां वल्लभ सम्प्रदाय के श्रीनाथजी का मंदिर है, 350 साल से अधिक पुरानी एक अद्भुत परंपरा चलती आ रही है, जिसमें भील आदिवासी प्रसाद 'लूटने' आते हैं।

यह आयोजन दीपावली के दूसरे दिन होता है, जब भगवान श्रीनाथजी को विभिन्न प्रकार के व्यंजनों से भोग अर्पित किया जाता है। लेकिन यहां का असली रोमांच तब शुरू होता है जब भक्त एकत्र होते हैं, और जैसे ही प्रसाद का वितरण होता है, सभी एक साथ मिलकर इसे लूटने में जुट जाते हैं! यह दृश्य न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि समर्पण और उत्सव का भी जश्न है। आइए जानते हैं इस अनोखे उत्सव की गहराइयों में, जहां भक्ति और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

प्रसाद और चावल को लूटकर झोली में भर लेते हैं भक्त

नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में अन्नकूट की परंपरा हर साल एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है, जहां सैकड़ों भक्तों की भीड़ एकत्र होती है। इस अनोखी परंपरा में स्थानीय लोग सजीव श्रद्धा के साथ प्रसाद और चावल को लूटकर अपनी झोली में भरते हैं और फिर खुशी-खुशी घर लौटते हैं। खास बात यह है कि इस विशेष अवसर पर मंदिर के द्वार सिर्फ आदिवासी भक्तों के लिए खोले जाते हैं।

मान्यता है कि जब आदिवासी भक्त इस अन्नकूट को लूटकर अपने घर जाते हैं, तो वे अपनी तिजोरी को अलग स्थानों पर रखते हैं, ताकि पूरे साल उनके घर में अन्न की कमी न हो।

20 क्विंटल चावल की धूमधाम

इस आयोजन में करीब 20 क्विंटल चावल को पकाकर एक विशाल ढेर में सजाया जाता है। भले ही मौसम गर्म हो, लेकिन आदिवासी भक्त भक्ति भाव से इस महाप्रसाद में शामिल होते हैं। यह अद्भुत महाप्रसाद उनके लिए वर्षभर के लिए आशीर्वाद बनकर रहता है।

इस विशेष परंपरा में गुजरात, महाराष्ट्र, और मध्य प्रदेश से श्रद्धालु नाथद्वारा आते हैं, और आस-पास के जिलों से भी भारी संख्या में लोग जुटते हैं। इसी कारण इस समय सभी होटल, धर्मशालाएं, और बसें खचाखच भरी रहती हैं।

आध्यात्मिक यात्रा का एक नया आयाम

यह परंपरा केवल धार्मिक भावनाओं का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखती है। भक्तों की श्रद्धा, आस्था, और उत्साह का यह अद्भुत संगम हर साल एक नई ऊर्जा के साथ जीवन्त रहता है, एक आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव प्रस्तुत करता है।

इस तरह, नाथद्वारा में अन्नकूट का यह आयोजन न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह समर्पण, प्रेम और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है।

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