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कौन थे ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जिनकी दरगाह पर मचा है बवाल, हर साल जाता था अकबर

Ajmer Sharif Dargah: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, जिनका जन्म फारसी मूल में हुआ था, 13वीं शताब्दी के महान सुन्नी मुस्लिम दार्शनिक और धार्मिक विद्वान थे। उन्हें गरीब नवाज और सुल्तान-हिंद के नाम से भी जाना जाता है। (Ajmer Sharif Dargah )ख्वाजा...
09:05 PM Nov 28, 2024 IST | Rajasthan First

Ajmer Sharif Dargah: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, जिनका जन्म फारसी मूल में हुआ था, 13वीं शताब्दी के महान सुन्नी मुस्लिम दार्शनिक और धार्मिक विद्वान थे। उन्हें गरीब नवाज और सुल्तान-हिंद के नाम से भी जाना जाता है। (Ajmer Sharif Dargah )ख्वाजा साहब ने भारतीय उपमहाद्वीप में सुन्नी इस्लाम के चिश्ती सिलसिले की स्थापना की, जो एक रहस्यमय सूफी आदेश था। उनका आगमन राजस्थान के अजमेर में हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी जीवन भर की साधना और उपदेशों से समाज में अमिट छाप छोड़ी। आज भी अजमेर में स्थित उनकी दरगाह, जो एक शानदार इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का उदाहरण है, श्रद्धालुओं के लिए आस्था और सम्मान का केंद्र है।

अजमेर दरगाह पर विवाद

दरअसल, अजमेर दरगाह इन दिनों चर्चा का विषय बन चुका है। यूपी के संभल में स्थित जामा मस्जिद के बाद अब राजस्थान के अजमेर में दरगाह शरीफ का सर्वे हो सकता है। एक निचली अदालत ने हिंदू पक्ष की उस याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिसमें अजमेर शरीफ दरगाह को हिंदू मंदिर बताया गया है। इसमें कहा गया है कि यहां पहले एक शिव मंदिर था। याचिका हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दायर की गई थी। इस मामले में अदालत का फैसला और विवाद के कई पहलुओं पर चर्चा की जा रही है। आइए जानते हैं ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और सूफीवाद की पूरी कहानी।

सूफीवाद और कट्टर इस्लाम के बीच अंतर

सूफीवाद इस्लाम का एक रहस्यमय रूप है, जो आंतरिक शुद्धता और ईश्वर की प्राप्ति पर जोर देता है। यह भौतिकता से दूर रहकर आत्म अनुशासन, समर्पण और मानवता की सेवा को महत्वपूर्ण मानता है। इसके विपरीत, कट्टरपंथी इस्लाम बाहरी आचरण पर ध्यान केंद्रित करता है। सूफीवाद के अनुयायी मानते हैं कि मानवता की सेवा करना ईश्वर की सेवा के समान है।

भारत में सूफीवाद का उदय

भारत में इस्लाम के आगमन के दौरान मुस्लिम आक्रमणकारी युद्धों और धर्मांतरण के दबाव में थे। हालांकि, इस्लाम को आसानी से स्वीकारने में भारतीय जनता को कठिनाई हुई। इस दौर में सूफीवाद का जन्म हुआ, जिसने संगीत और नृत्य के माध्यम से भक्ति मार्ग को लोकप्रिय किया। सूफियों ने हिंद-इस्लामी संस्कृति के बीच एक सेतु का कार्य किया और दोनों धर्मों को एकजुट किया।

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