Rajasthan: राजस्थान उपचुनाव में परिवारवाद की छाया! क्या सत्ता पर परिवार का कब्जा, कार्यकर्ताओं के अरमानों पर ब्रेक?
Rajasthan By-Election 2024:राजस्थान के उपचुनाव में (Rajasthan By-Election 2024)परिवारवाद की चौंकाने वाली राजनीति ने हर किसी को हैरान कर दिया है। सत्ता के दिग्गज नेता अब अपने परिवार को टिकट और बड़े पद दिलाने में जुटे हैं, जिससे स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता किरोड़ी लाल मीणा से लेकर आरएलपी प्रमुख हनुमान बेनीवाल तक, सभी ने उपचुनाव में अपने परिवार के सदस्यों को चुनावी टिकट देकर परिवारवाद को हवा दी है। सवाल उठता है कि क्या राजस्थान की राजनीति अब सिर्फ परिवार की सत्ता तक सिमट जाएगी, या उपचुनावों में लोकतंत्र की बुनियादी भावनाओं की फिर से जीत होगी?
किरोड़ी लाल मीणा का राजनीतिक सफर... परिवारवाद का चौंकाने वाला असर
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और वर्तमान कृषि मंत्री, डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का राजनीतिक सफर कई मोड़ों से भरा हुआ है। एक समय था जब उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से अपनी पत्नी, गोलमा देवी को विधानसभा चुनाव में उतारा और जीत दिलाई। गोलमा देवी बाद में कांग्रेस सरकार में मंत्री बनीं, लेकिन किरोड़ी लाल मीणा ने कुछ समय बाद भाजपा में वापसी की।
आज, वे कैबिनेट मंत्री के रूप में भाजपा सरकार में अपनी सेवा दे रहे हैं और अपने भाई को दोसा विधानसभा सीट से टिकट दिलाकर परिवार का प्रभाव बढ़ाने में सफल रहे हैं। हालांकि, मीणा के इस कदम ने पार्टी में कई कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष पैदा कर दिया है। कार्यकर्ता, जो वर्षों से मेहनत कर रहे हैं, अब खुद को इस परिवारवाद की प्रतिस्पर्धा में हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। क्या ये कृत्य लोकतंत्र की भावना को कमजोर कर रहे हैं?
आरएलपी में परिवारवाद का गहरा संकट
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के संस्थापक हनुमान बेनीवाल भी इस परिवारवाद के खेल में शामिल हैं। उन्होंने अपने भाई नारायण बेनीवाल और पत्नी कनिका बेनीवाल को टिकट दिया है, जिसे पार्टी के कई समर्थक पारिवारिक राजनीति के रूप में देख रहे हैं। इस स्थिति से आरएलपी के भीतर मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, खासकर जब बाड़मेर के मौजूदा सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल बेनीवाल ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। इससे आरएलपी के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं।
राजस्थान की राजनीति में परिवारवाद का गहरा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो कार्यकर्ताओं के राजनीतिक सपने अधूरे रह सकते हैं। असंतुष्ट कार्यकर्ता अब राष्ट्रीय दलों की ओर रुख कर सकते हैं, जहां उन्हें समान अवसर मिल सकें।
अगर राजस्थान की राजनीति में परिवारवाद का यह बढ़ता प्रभाव नहीं रोका गया, तो इससे युवा और होनहार नेताओं के लिए अवसर कम होते जाएंगे। यह समय है कि राजनीतिक दल इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान दें और लोकतंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएं।
परिवारवाद की राजनीति का बोलबाला...
झुंझुनूं सीट पर कांग्रेस ने दिग्गज नेता शीशराम ओला की तीसरी पीढ़ी को मैदान में उतारा है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री शीशराम ओला आठ बार विधायक और पांच बार सांसद रह चुके हैं। उनके बेटे बृजेन्द्र ओला, जो पहले चार बार विधायक रह चुके हैं, अब सांसद बन गए हैं। अब बृजेन्द्र के बेटे, अमित ओला चुनावी मैदान में हैं। बृजेन्द्र ओला की पत्नी राजबाला ओला भी जिला प्रमुख रह चुकी हैं, जो इस परिवार की राजनीतिक विरासत को और मजबूत बनाती है।
रामगढ़ सीट पर कांग्रेस ने दिवंगत विधायक जुबेर खान के बेटे आर्यन को टिकट दिया है। जुबेर खान ने रामगढ़ से चार बार विधायक का पद संभाला था, जबकि उनकी पत्नी सफिया खान एक बार विधायक रह चुकी हैं। अब उनके बेटे को कांग्रेस ने चुनावी मैदान में उतारा है।
बीजेपी की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। सलूंबर सीट पर भाजपा ने अपने दिवंगत विधायक अमृतलाल मीणा की पत्नी शांता देवी को टिकट दिया है। अमृतलाल मीणा तीन बार सलूंबर से विधायक रह चुके थे, और उनकी पत्नी नगरपालिका अध्यक्ष और तीन बार सरपंच भी रह चुकी हैं।
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