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Rajasthan By-Elections: कम वोटिंग का बड़ा रहस्य...विधानसभा- लोकसभा चुनाव के सर्वे में सामने आए अनदेखे कारण, जानें उपचुनाव का भविष्य!

Low Voter Turnout: राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कम वोटिंग (Low Voter Turnout)का रहस्य अब स्पष्ट हो गया है। निर्वाचन विभाग के नॉलेज एटीट्यूड प्रेक्टिस (KAP) बेसलाइन सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले कारणों ने चिंता की लकीरें खींच...
02:19 PM Oct 20, 2024 IST | Rajesh Singhal

Low Voter Turnout: राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कम वोटिंग (Low Voter Turnout)का रहस्य अब स्पष्ट हो गया है। निर्वाचन विभाग के नॉलेज एटीट्यूड प्रेक्टिस (KAP) बेसलाइन सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले कारणों ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं। सियासी उदासीनता, सही प्रत्याशी की अनुपलब्धता, लंबी कतारें, परिवहन का अभाव, और खराब मौसम—इन सभी ने मिलकर मतदान प्रतिशत को प्रभावित किया है।

विशेष रूप से करौली और बीकानेर जैसे जिलों में, स्वीप गतिविधियों को तेज करने के लिए विशेष शिविरों और युवा वोटर्स को आकर्षित करने की योजनाओं की सिफारिश की गई है। यह सर्वे उन सवालों को उठाता है जो चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सेलिब्रिटीज़ और खास व्यक्तित्वों की भूमिका पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं।

क्या ये नए खुलासे राजस्थान की राजनीति में चुनावी माहौल को एक नई दिशा देने की ओर इशारा कर रहे हैं? इस रहस्य को सुलझाना आवश्यक है, क्योंकि यह भविष्य में राजनीतिक दृष्टिकोण और मतदाता सहभागिता को तय करेगा।

स्टेट आइकन की प्रभावशीलता पर उठे सवाल!

10834 में से 5635 वोटर्स (52.01%) ने स्टेट आइकन से मतदान के लिए कोई संदेश नहीं पाया।
यह साफ है कि सिर्फ स्टेट आइकन बनाने से काम नहीं चलेगा; इनकी प्रभावशीलता और वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने की कोशिशों की गंभीर मॉनिटरिंग की आवश्यकता है।

वेबसाइट पर जानकारी की कमी!

सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि भारत निर्वाचन आयोग के ऑनलाइन और पारदर्शी सिस्टम के बावजूद 71.81 प्रतिशत मतदाता आयोग की वेबसाइट www.voters.eci.gov.in का एक्सेस नहीं कर पाए।

केवल 28.19 प्रतिशत वोटर्स को ही इस महत्वपूर्ण जानकारी का लाभ मिला।

सही प्रत्याशी की अनुपलब्धता और सियासी उदासीनता!

वोटर्स अपने मताधिकार के प्रति जागरूक हैं, लेकिन सियासी उदासीनता और उपयुक्त प्रत्याशी न मिलने से मतदाता प्रेरणा में कमी आई है।
70.65 प्रतिशत वोटर्स ने प्रत्याशियों की परख के आधार पर वोटिंग की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी संबंध, परिवार, जाति और धर्म से ज्यादा प्रत्याशी का चुनाव महत्वपूर्ण है।

लंबी कतारों का खौफ!

सर्वे में 63.22 प्रतिशत वोटर्स ने लंबी कतारें और परिवहन के अभाव को मतदान में सबसे बड़ी बाधा माना।
पोलिंग बूथों के रेशनलाइजेशन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है ताकि ये समस्याएं दूर हो सकें।

विधानसभा और लोकसभा चुनाव में दिलचस्पी का अंतर!

सर्वे के निष्कर्ष बताते हैं कि विधानसभा चुनाव में 91.07 प्रतिशत वोटिंग के मुकाबले लोकसभा चुनाव में केवल 88.14 प्रतिशत वोटिंग हुई।
ये आंकड़े बताते हैं कि वोटर्स की दिलचस्पी कम हो रही है, जबकि 29 प्रतिशत लोगों ने कहा कि चुनाव में बाहुबल का उपयोग 3 प्रतिशत तक कम हुआ है।

ईवीएम पर वोटर्स का भरोसा!

भले ही ईवीएम पर सवाल उठाए गए हों, लेकिन 84.23 प्रतिशत मतदाता अब भी इन पर भरोसा करते हैं।
अलग-अलग वर्गों में ईवीएम पर भरोसा: 80.98 प्रतिशत एसटी, 81.76 प्रतिशत एससी, 84.81 प्रतिशत ओबीसी, और 86.66 प्रतिशत सामान्य वर्ग ने ईवीएम पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।

सहयोगी मतदान कर्मियों का रुख!

97 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने मतदान कराने वाले कर्मियों और सहायक स्टाफ का व्यवहार सहयोगी पाया।
इस व्यापक सर्वे में वोटिंग को अनिवार्य करने पर अधिकांश वोटर्स ने सकारात्मक रुख दिखाया, जो कि हमारे लोकतंत्र में उनकी आस्था को दर्शाता है।

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