Madhubani Painting: बजट के दिन सीतारमण की साड़ी आई चर्चा में, जानिए मधुबनी कला का इतिहास
Madhubani Painting: देश भर में आज बजट की चर्चा हो रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश किया। बजट के दिन आज और बातों के अलावा जो चीज़ सबसे ज्यादा चर्चा में रही वो है वित्त मंत्री की साड़ी । वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज अपना आठवां बजट मधुबनी कलाकृति से सजी साड़ी (Sitaraman Saree On Budget 2025) पहनकर पेश किया। उसके बाद से ही यह साड़ी और मधुबनी पेंटिंग (Madhubani Painting) चर्चा का विषय बना हुआ है।
बिहार की पद्म श्री विजेता दुलारी देवी ने वित्त मंत्री को साड़ी की थी भेंट
वित्त मंत्री ने आज जिस साडी को पहना था, वह साड़ी उन्हें पद्म श्री पुरस्कार विजेता बिहार की दुलारी देवी (Dulari Devi) ने एक उपहार के रूप में दिया था। वित्त मंत्री ने यह साड़ी आज भारत का बजट पेश करते हुए पहन कर सदियों पुरानी मधुबनी कला को एक ट्रिब्यूट दिया है। प्रसिद्ध मधुबनी कलाकार (Madhubani Painting) और पद्म श्री-विजेता दुलारी देवी ने बिहार के मधुबनी में मिथिला कला संस्थान में एक क्रेडिट आउटरीच कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात की थी। उन्होंने निर्मला सीतारमण से मधुबनी कला के सांस्कृतिक महत्व पर सार्थक चर्चा भी की थी। इसी कार्यक्रम में दुलारी देवी ने सीतारमण को हाथ से पेंट की हुई एक साड़ी भेंट की और इसे एक विशेष अवसर पर पहनने की इच्छा व्यक्त की थी।
मधुबनी पेंटिंग क्या है?
मधुबनी पेंटिंग, जिसे मिथिला कला के नाम से भी जाना जाता है, एक लोक कला (What is Madhubani Painting) है जिसकी उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई थी। यह अपने जटिल पैटर्न, जीवंत रंगों और पौराणिक कथाओं, प्रकृति और सामाजिक विषयों के चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। पेंटिंग पारंपरिक रूप से आधुनिक उपकरणों के बजाय प्राकृतिक रंगों और उंगलियों, टहनियों या ब्रश का उपयोग करके मिट्टी की दीवारों, हस्तनिर्मित कागज या कपड़े पर की जाती है। ज्यामितीय पैटर्न और प्रतीकात्मक तत्व मधुबनी को अद्वितीय और आकर्षक बनाते हैं।
मधुबनी कला का इतिहास और उत्पत्ति
मधुबनी पेंटिंग 2,500 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। पौराणिक कथा के अनुसार, इसका निर्माण सबसे पहले देवी सीता के पिता राजा जनक के समय हुआ था। जब सीता का विवाह भगवान राम से होना था, तो जनक ने महल की दीवारों को सुंदर चित्रों से सजाने के लिए कलाकारों को नियुक्त किया। यहीं से मधुबनी कला की शुरुआत हुई।
सदियों से, मधुबनी कला (Madhubani Painting History) माताओं से बेटियों तक हस्तांतरित की जाती थी, जिसे घरों की दीवारों पर दैनिक जीवन, रीति-रिवाजों और देवताओं को चित्रित करने के लिए चित्रित किया जाता था। यह एक छिपी हुई परंपरा बनी रही, जिसका अभ्यास मुख्य रूप से मिथिला क्षेत्र की महिलाएं करती थीं। विषयों में रामायण, महाभारत, हिंदू देवता (शिव, दुर्गा, कृष्ण, लक्ष्मी, सरस्वती), और प्रकृति-प्रेरित रूपांकन शामिल थे।
भूकंप के कारण उजागर हुई थी ये पेंटिंग्स
1934 में, बिहार में एक बड़े भूकंप के कारण घरों की टूटी हुई दीवारों पर ये पेंटिंग्स उजागर हो गईं, जिससे ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी विलियम आर्चर का ध्यान आकर्षित हुआ, जिन्होंने इनका दस्तावेजीकरण (Madhubani Painting Connection with Earthquake) किया। 1960 के दशक तक भारत सरकार ने महिला कलाकारों को अपनी कला को कागज और कपड़े पर फिर से बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे इसे दुनिया भर में पहचान हासिल करने में मदद मिली। आज मधुबनी कला विश्व स्तर पर जानी जाती है और इसका उपयोग साड़ियों, घरेलू सजावट, पेंटिंग और यहां तक कि फैशन के सामान में भी किया जाता है।
मधुबनी पेंटिंग के प्रकार
थीम और तकनीकों के आधार पर मधुबनी पेंटिंग (Types of Madhubani Painting) को विभिन्न शैलियों में वर्गीकृत किया गया है:
भरनी शैली - चमकीले रंगों से भरपूर, देवी-देवताओं और प्रकृति का चित्रण।
कचनी शैली - विवरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए, न्यूनतम रंगों के साथ जटिल रेखा का काम।
तांत्रिक शैली - आध्यात्मिक और तांत्रिक विषयों पर आधारित, जिसमें अक्सर यंत्र और देवता शामिल होते हैं।
कोहबर और गोधना शैली - शादियों और शुभ अवसरों के लिए उपयोग की जाती है, जिसमें समृद्धि के प्रतीक के रूप में कमल, बांस, मछली और सांप शामिल होते हैं।
प्रत्येक शैली मिथिला क्षेत्र की गहरी परंपराओं और मान्यताओं को दर्शाती है।
साड़ी और वस्त्र पर मधुबनी
बजट दिवस 2025 पर निर्मला सीतारमण की मधुबनी साड़ी ने लोक कला को आधुनिक फैशन में शामिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला। डिजाइनर पारंपरिक मधुबनी रूपांकनों को साड़ियों, कुर्तों, दुपट्टों और एक्सेसरीज़ में मिश्रित कर रहे हैं, जिससे वे भारत और अंतर्राष्ट्रीय दोनों बाजारों में लोकप्रिय हो रहे हैं। इस कला का उपयोग अब दीवार पेंटिंग, कुशन कवर, लैंप और फर्नीचर में किया जाता है, जो अंदरूनी हिस्सों में एक सांस्कृतिक स्पर्श भी दर्शाता है। मधुबनी पेंटिंग को दुनिया भर में प्रदर्शित किया गया है, पेरिस, टोक्यो और लंदन के संग्रहालयों से लेकर प्रतिष्ठित फैशन शो तक। कई अंतरराष्ट्रीय डिजाइनर मिथिला रूपांकनों को अपनी रचनाओं में शामिल करते हैं।
मधुबनी पेंटिंग आज क्यों महत्वपूर्ण है?
सांस्कृतिक विरासत: यह सदियों पुरानी लोक परंपरा को जीवित रखती है, नई पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ती है।
महिला कलाकारों का सशक्तिकरण: मधुबनी पेंटिंग ने बिहार में हजारों ग्रामीण महिलाओं को आजीविका प्रदान की है, जिससे आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा मिला है।
पर्यावरण-अनुकूल कला: प्राकृतिक रंगों और जैविक सामग्रियों का उपयोग इसे कला का एक टिकाऊ रूप बनाता है।
भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा: तेजी से फैशन और डिजिटल कला के उदय के साथ, मधुबनी पेंटिंग हस्तनिर्मित, जटिल शिल्प कौशल को फिर से फोकस में लाती है।
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