Mata Ashapura Temple: राजस्थान के डूंगरपुर में स्थित माता आशापुरा मंदिर को माना जाता है राजपूत वंशों की कुलदेवी
Mata Ashapura Temple: राजस्थान के डूंगरपुर में माता आशापुरा मंदिर, देवी आशापुरा (Mata Ashapura Temple) को समर्पित एक प्रतिष्ठित हिंदू मंदिर है, जिन्हें जडेजा और राजपूत वंशों की कुलदेवी के रूप में भी जाना जाता है। यह मंदिर देश के शक्तिपीठों में से एक है। डूंगरपुर जिले से 16 किलोमीटर दूर बागड़ के निठाउवा में स्थापित मां आशापुरा केवल मेवाड़ ही नहीं बल्कि मारवाड़, गुजरात, मध्य प्रदेश में भी लोगों के बीच बहुत प्रसिद्ध हैं। मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है, जहां से आसपास के क्षेत्र का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। मंदिर में स्थापित माँ की मूर्ति के साथ अनेक रहस्यमयी कहानियां जुड़ी हैं।
मंदिर का इतिहास और किंवदंती
ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर कई सदियों पुराना है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर (Mata Ashapura Temple) की स्थापना डूंगरपुर रियासत के शासकों ने की थी, जो आशापुरा देवी के भक्त थे। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी आशापुरा देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। ऐसा माना जाता है कि वह अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरा करती हैं और उन्हें बुरी ताकतों से बचाती हैं। यह मंदिर स्थानीय समुदाय के लिए अत्यधिक महत्व रखता है और दूर-दूर से भक्तों को आकर्षित करता है।
पौराणिक कहानी के अनुसार, आशापुरा माता पृथ्वीराज चौहान की आराध्य कुलदेवी थीं। इनकी मूर्ति को 1380 में एक शासक मोद पाल ने नाडोल से लाकर यहां स्थापित कराई थी। मोद पाल, पृथ्वीराज चौहान के वंश थे। वो नाडोल के शासक थे। बताया जाता है कि चौदहवीं शताब्दी में मुस्लिम हमलवारों ने नाडोल पर आक्रमण कर दिया। मोद पाल के 32 पुत्र थे। मुस्लिम हमलावरों के खिलाफ सभी वीरता से लड़े। इसमें काकाजी गंगदेव व मोद पाल ने मिलकर वीरता दिखाई। युद्ध में मोद पाल को बहुत चोट आयी। कहा जाता है कि 1352 ईस्वी में ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी के दिन माता आशापुरा (Mata Ashapura Temple) ने मोद पाल के स्वप्न में आकर आदेश दिया कि मेरी प्रतिमा को रथ में रखकर मालवा की ओर चल दो, जहां पर रथ रुक जाए वहां पर शासन जमा लेना। मोद पाल ने आदेश का पालन किया। कई दिक्कतों और परेशानियों के बाद मोद पाल ने सांडलपोर में अपना किला बनाया। वहीं पर मोदपुर गांव बस गया है। वहीँ पर माता की स्थापना हुई। तब से माता आशापुरा गामडी निठाउवा में विराजमान है।
माता की चौखट पर श्रद्धालु, संतान प्राप्ति, असाध्य बिमारियों के निवारण, नौकरी, धंधा हेतु मनोकामनाएं करते हैं। सारी इच्छाएं पूर्ण होने पर भक्त जन मंदिर में चूरमा-बाटी, भोजन, वस्त्र, जेवर चढ़ाते है। माता जी (Mata Ashapura Temple) को चढ़ाए गए वस्त्रों को किसी को भी पहनने की अनुमति नहीं है। हर साल वर्षा ऋतु में सभी वस्त्र माही नदी में विसर्जित कर दिए जाते हैं। वर्तमान में मंदिर की व्यवस्था हेतु चौहान राजपूतों का एक पंजीकृत ट्रस्ट निर्मित है। जिनके द्वारा मंदिर की देख रेख की जाती है।
त्यौहार और उत्सव
त्योहारों के दौरान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखी जाती है, खासकर नवरात्रि के दौरान, जिसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। देवी दुर्गा को समर्पित नौ दिवसीय त्योहार, नवरात्रि, माता आशापुरा मंदिर (Mata Ashapura Temple) में एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस दौरान मंदिर में विस्तृत अनुष्ठान, पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। माता आशापुरा मंदिर न केवल राजस्थान से बल्कि गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से भी भक्तों को आकर्षित करता है। तीर्थयात्री स्वास्थ्य, समृद्धि और कल्याण के लिए देवी आशापुरा का आशीर्वाद लेने के लिए मंदिर जाते हैं। यह मंदिर उन पर्यटकों का भी स्वागत करता है जो इसकी वास्तुकला की प्रशंसा करने और इसके आध्यात्मिक माहौल का आनंद लेने आते हैं। एक पहाड़ी पर स्थित मंदिर आसपास के परिदृश्य का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है।
मंदिर तक कैसे पहुंचें
डूंगरपुर सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। निकटतम रेलवे स्टेशन डूंगरपुर रेलवे स्टेशन (Mata Ashapura Temple) है, जो जयपुर, उदयपुर और अहमदाबाद जैसे प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। रेलवे स्टेशन से, आगंतुक मंदिर तक पहुंचने के लिए टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या स्थानीय परिवहन का उपयोग कर सकते हैं। राजस्थान के डूंगरपुर में माता आशापुरा मंदिर न केवल एक पूजा स्थल है बल्कि सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य सुंदरता का प्रतीक भी है। भक्त और पर्यटक इस मंदिर में आशीर्वाद लेने, इसकी भव्यता देखने और इसकी आध्यात्मिक आभा में डूबने के लिए आते हैं। चाहे आप एक श्रद्धालु तीर्थयात्री हों या जिज्ञासु यात्री, माता आशापुरा मंदिर की यात्रा निश्चित रूप से एक अमिट छाप छोड़ेगी।