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Hinglaj Mata Mandir: पाकिस्तान स्थित इस शक्ति पीठ पर हिन्दू ही नहीं मुस्लिम भी नवाते हैं शीश, नवरात्रि पर जुटती है लाखों की भीड़

Hinglaj Mata Mandir: आज हम जिस शक्ति पीठ की बात करने जा रहे हैं वो भारत में नहीं बल्कि पडोसी मुल्क पाकिस्तान में स्थित है। हम बात कर रहे हैं हिंगलाज शक्ति पीठ (Hinglaj Mata Mandir) की। यह मंदिर पाकिस्तान...
12:01 PM Jun 21, 2024 IST | Preeti Mishra
(Image Credit: Social Media)

Hinglaj Mata Mandir: आज हम जिस शक्ति पीठ की बात करने जा रहे हैं वो भारत में नहीं बल्कि पडोसी मुल्क पाकिस्तान में स्थित है। हम बात कर रहे हैं हिंगलाज शक्ति पीठ (Hinglaj Mata Mandir) की। यह मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान के बीहड़ इलाकों में हिंगलाज घाटी में स्थित है। यह पवित्र मंदिर पाकिस्तान में सबसे बड़ा हिंदू तीर्थस्थल है। इस मंदिर को नानी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

कहां पर है यह मंदिर स्थित

बलूचिस्तान के ल्यारी तहसील के एक एकांत पहाड़ी क्षेत्र में स्थित यह मंदिर (Hinglaj Mata Mandir) कराची के उत्तर-पश्चिम में लगभग 250 किलोमीटर दूर एक संकीर्ण घाटी में स्थित है। यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर मकरान रेगिस्तान में किरथर पर्वत श्रृंखला के अंत में है। यह मंदिर विश्व भर के हिंदू समुदाय के आध्यात्मिक ताने-बाने में गहराई से समाया हुआ है और यहां नवरात्रि के अवसर पर होने वाले में वार्षिक हिंगलाज यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां मत्था टेकने आते हैं।

इस शक्ति पीठ में गिरा था माता का सिर

यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। किंवदंती के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव की पत्नी सती का सिर यहां गिरा था, जिससे यह दैवीय ऊर्जा और पूजा का एक शक्तिशाली स्थल बन गया। हिंगलाज माता (Hinglaj Mata Mandir) की यात्रा जितनी कठिन है उतनी ही आध्यात्मिक रूप से फायदेमंद भी है। हिंगलाज माता मंदिर सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि आस्थाओं का संगम है।

कैसा है यह मंदिर

इस मंदिर की खास बात यह है कि ये छोटी से प्राकृतिक गुफा में बना हुआ है। मंदिर में मिट्टी की एक वेदी बनी हुई है। यहां विराजने वाली माता हिंगलाज की कोई मानव निर्मित मूर्ति नहीं है। यहां एक छोटे आकर के शिला की पूजा माता हिंगलाज देवी के रूप में की जाती है। कहा जाता है कि यहां हर रात सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते ही माता हिंगलाज के भीतर समा जाती हैं। यहां का मंदिर एक गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। मंदिर की खास बात यह है कि यहां कोई दरवाजा नहीं है। मंदिर की परिक्रमा के लिए भक्त एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरे रास्ते से निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चसमा है।
मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती है। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्री गणेश और कलिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्म कुंड और पीर कुंड प्रसिद्ध तीर्थ हैं। मंदिर में दाखिल होते ही सबसे पहले भगवान गणेश के दर्शन होते हैं। सामने ही माता हिंगलाज की प्रतिमा है जो साक्षात वैष्णो देवी का रूप हैं।

भगवान राम ने की थी यहां की यात्रा

जनश्रुति है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने भी हिंगलाज माता मंदिर की यात्रा की थी। हिन्दू धर्म ग्रंथों और संतों की कथाओं में भी यह बात सामने आती है कि माता के इसी स्थान पर भगवान विष्णु के कलावतार भगवान परशुराम के पिता महृषि जमदग्नि ने घोर तप किया था। उनके नाम पर आशाराम नामक स्थान अब भी यहां मौजूद है। कहा यह भी जाता है कि इस मंदिर में माता की पूजा करने गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव और दादा मखान जैसे कई महान संत आ चुके हैं।

मुसलमानों के लिए नानी पीर हैं माता

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसकी देखरेख मुस्लिम समुदाय के लोग करते हैं। मुस्लिम इसे एक चमत्कारिक स्थान मानते हैं। जब पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ था और भारत की पश्चिमी सीमा अफ़ग़ानिस्तान और ईरान से लगती थी, उस समय हिंगलाज हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ तो था ही, बलूचिस्तान के मुसलमान भी हिंगला देवी की पूजा करते थे और उन्हें नानी कह कर पुकारते थे। मुस्लिम लोग यहां लाल कपडा, अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र और फिरनी चढ़ाते थे। हिंगलाज शक्ति पीठ हिन्दुओं और मुसलमानों का संयुक्त महातीर्थ था। हिन्दुओं के लिए यह स्थान शक्ति पीठ तो मुसलमानों के लिए नानी पीर है। कई बार इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की गयी। लेकिन यहां रह रहे हिन्दुओं और मुसलमानों ने इस मंदिर को बचाया। कहते हैं की जब यह हिस्सा भारत के हाथ से चला गया था तब कुछ आतंकवादियों ने मंदिर को नुकसान पंहुचाने की कोशिश की थी, लेकिन वो सब के सब हवा में लटक गए थे।

नवरात्रि पर जुटती है लाखों की भीड़

नवरात्रि के दौरान पुरे नौ दिन तक यहां शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। इस दौरान भक्त पूजा करते हैं, भजन गाते हैं और आध्यात्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। इस दौरान सिंध और कराची के लाखों हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं। भारत से भी हर साल एक दल यहां दर्शन करने जाता है। हिंगलाज माता का महत्व धर्म की सीमाओं से परे है। यह सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक है, जहां पाकिस्तान की हिंदू विरासत का जश्न मनाया और संरक्षित किया जाता है।

बलूचिस्तान में हिंगलाज माता मंदिर तक कैसे पहुंचें

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंगलाज माता मंदिर तक पहुंचने के लिए ऊबड़-खाबड़ इलाकों से होकर यात्रा करनी पड़ती है। निकटतम प्रमुख शहर कराची है, जो लगभग 250 किलोमीटर दूर है। कराची से आप मकरान तटीय राजमार्ग के माध्यम से सड़क मार्ग से यात्रा कर सकते हैं। सार्वजनिक परिवहन सीमित है, इसलिए निजी वाहन किराए पर लेने या तीर्थयात्रा समूह में शामिल होने की सिफारिश की जाती है। यह मार्ग हिंगोल नेशनल पार्क से होकर गुजरता है। उबड़-खाबड़ सड़कों के कारण अंतिम हिस्से के लिए अच्छे वाहन की आवश्यकता होती है। तीर्थयात्रा, हालांकि चुनौतीपूर्ण है, हिंगलाज माता का आशीर्वाद पाने वाले भक्तों के लिए आध्यात्मिक रूप से फायदेमंद अनुभव है।

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